
बलरामपुर कुसमी एक ओर जहां pwd घोटालों का प्रयाय बनते जा रहा है वहीं एक पिता अपने दिगंत पुत्र को न्याय दिलाने के लिए 11 महीनों से कानूनी लड़ाई लड़ रहा है लेकिन न्याय उसे आज तक नहीं मिल पाई है। मामला बलरामपुर जिले के कुसमी अंतर्गत कंजिया ग्राम का है जहां 18/01/2025 को प्रदीप यादव के पुत्र की मौत पड़ोसी के लापरवाही के चलते हो गई थी।

जब मासूम रुद्रप्रताप यादव दीवार के पास खेल रहा था तभी दिवारी से सटा कर रखा गया गिट्टी भारी मात्रा में मासूम के उपर जा गिरा जिससे मासूम की मौत हो गई। अगर यह गिट्टी सही तरीके से किसी सुरक्षित जगह पर रखी होती तो आज एक पिता को इतने बड़े दुख का सामना नहीं करना पड़ रहा होता। इतने बड़े और गंभीर मामले को आज पर्यंत तक लटका के रखना और एक पिता को न्याय के लिए भटकने के लिए विवश करना क्या यहीं न्याय है..?

इस मामले पर pwd से पुलिस के द्वारा जांच कर अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा गया था लेकिन pwd के एसडीओ और सब इंजीनियर को 11 महीनों तक यह सुध नहीं है कि एक मासूम की मौत हुई है और उसका पिता न्याय के लिए भटक रहा है,यह कितनी हृदय विदारक घटना है क्योंकि यह केवल उस व्यक्ति को पता होगा कि उसके साथ क्या हुआ है और उसने क्या खोया है बाकी लोगों के लिए तो यह एक मामला मात्र है,क्योंकि जिसपर बीतती है वहीं जान सकता है कि उसके कष्ट की परिभाषा क्या है कोई और नहीं। Pwd की लापरवाह एसडीओ और सब इंजीनियर की मेहरबानी है कि आज तक एक जांच रिपोर्ट तैयार नहीं हो पाई है आखिर इन 11 महीना में क्या एसडीओ और सब इंजीनियर को एक दिन के लिए भी समय नहीं था कि वह जाकर यथा स्थिति को देखकर एक जांच रिपोर्ट तैयार कर पुलिस को सौंप दें जिससे मासूम को न्याय मिल सके लेकिन शायद इस मामले पर भी पीडब्ल्यूडी के एसडीओ और सब इंजीनियर कुछ रिश्वत के इंतजार में होंगे कि कहीं से मृतक का पिता कुछ चाय पानी का व्यवस्था करवा दे इसके बाद वह सभी जाकर के इस जांच की फॉर्मेलिटी को पूरा कर सकें।

जब पुलिस के द्वारा pwd से इस मामले में जांच रिपोर्ट सपने को कहा गया था तो आज तक इतने महीने बीत जाने के बावजूद एक जांच रिपोर्ट तैयार क्यों नहीं की गई क्या लोक निर्माण विभाग के अधिकारी इतने व्यस्त हैं कि उन्हें एक जांच रिपोर्ट तैयार करने का समय नहीं है या फिर इतनी भ्रष्ट है कि एक मासूम बच्चे की मौत के बावजूद अपने जेब गर्म करने के इंतजार में बैठे हैं और सोच रहे होंगे की मासूम का पिता प्रदीप यादव आकर उन्हें चाय पानी पेट्रोल खर्च और मेहनताना तथा घर में रोटी पानी के लिए कुछ व्यवस्था करवा दे ताकि उन्हें अपने वेतन से ₹1 खर्च न करना पड़े और इतना सब कुछ लेने के बाद वह जाकर के जांच रिपोर्ट बना कर साइन करके पुलिस को सौंप दें। यह एक पिता के लिए कितनी बड़ी घटना है वह प्रदीप यादव ही समझ सकते हैं क्योंकि उन्होंने क्या खाया है यह उनके अतिरिक्त और कोई नहीं समझ सकता लेकिन इस बीच सबसे घटिया और घटिया कार्य शैली की प्रकाष्ठा लोक निर्माण विभाग के एसडीओ और सब इंजीनियर के द्वारा की जा रही है आखिर किस बात का वेतन लेते हैं यह अधिकारी किस बात की सैलरी इनको मिलती है जो एक मासूम को न्याय दिलाने में मदद ना कर सके और यह कोई इंसानियत के लिए किया गया काम नहीं बल्कि इस सैलरी से मिलने वाला दायित्व है जिसके तहत लोक निर्माण विभाग को इस काम को करके देना चाहिए था लेकिन कान में तेल डालकर बेशर्मी से बैठे कुछ अधिकारी हैं जिन्हें तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता जब तक बिल्कुल वही घटना उनके साथ ना हो। अपने मासूम मृतक पुत्र को न्याय दिलाने के लिए दर भटकने वाला व्यक्ति आखिर जाए तो जाए कहां और क्या उसे मनुष्यकृत न्याय प्रणाली से नए मिलेगा या नहीं यह भी समस्या पर है, या फिर पीड़ित को अब ऊपर वाले के इंसाफ पर ही सब छोड़ देना चाहिए।










